पहला बजट आज, आर्थिक नीति में बड़े बदलाव के संकेत
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में नई चुनी गई सरकार के तहत पहला पूर्ण बजट सोमवार दोपहर राज्य विधानसभा में पेश किया जाएगा। पत्रकार से राजनेता बने नवनियुक्त राज्य के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता अपना पहला बजट भाषण पढ़ रहे हैं। इस बजट में राज्य के कर राजस्व सृजन (Tax Revenue Generation), बेहतर कर्ज प्रबंधन और बड़े औद्योगिक निवेश को आकर्षित करने पर मुख्य फोकस रहने की उम्मीद है। बजट पेश होने से ठीक पहले राज्य की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने सकारात्मक संदेश देते हुए कहा कि सरकार जनता द्वारा मिले भारी जनादेश का सम्मान करती है और प्रदेश के नागरिकों को इस बजट से कोई निराशा नहीं होगी।
टैक्स का अतिरिक्त बोझ बढ़ाए बिना राजस्व वृद्धि का लक्ष्य
आमतौर पर किसी भी बजट के आने से पहले आम जनता में नए करों या टैक्स की दरें बढ़ने की आशंका रहती है। इस संबंध में नागरिकों के डर को दूर करते हुए वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उनका उद्देश्य मौजूदा कर ढांचे में सुधार करना है, न कि जनता पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालना। उन्होंने इस पारंपरिक धारणा का खंडन किया कि राजस्व केवल टैक्स की दरें बढ़ाकर ही इकट्ठा किया जा सकता है। उनके मुताबिक, कई बार टैक्स की दरों में तर्कसंगत कमी करने से भी व्यापार बढ़ता है और परिणामस्वरूप कर संग्रह में वृद्धि होती है। उनका मुख्य लक्ष्य मौजूदा दरों को स्थिर रखते हुए राजस्व के नए स्रोत तलाशना है।
राजकोषीय सेहत और बढ़ते कर्ज के प्रबंधन की चुनौती
आर्थिक सलाहकारों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आम जनता को परेशान किए बिना राजस्व बढ़ाने का दासगुप्ता का यह फॉर्मूला तभी सफल होगा जब राज्य सरकार कर सृजन के लिए केवल पारंपरिक जरियों पर निर्भर रहने के बजाय नए रास्ते खोलेगी। पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में अर्थशास्त्रियों की मुख्य शिकायत यही थी कि राज्य का कर संग्रह मुख्य रूप से केवल दो मदों—राज्य वस्तु एवं सेवा कर (SGST) और राज्य उत्पाद शुल्क (State Excise) तक ही सीमित था।
इसके अलावा, नए वित्त मंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य की नाजुक राजकोषीय स्थिति और संचित कर्ज का प्रबंधन करना है, जिसके 31 मार्च, 2027 तक बढ़कर लगभग ₹8.15 लाख करोड़ होने का अनुमान है (जो कि वर्ष 2011 में वाम मोर्चा शासन के अंत के समय महज ₹1.99 लाख करोड़ था)। विशेषज्ञों के अनुसार, इस गंभीर कर्ज संकट से निपटने के लिए कर राजस्व में बढ़ोतरी के साथ-साथ गैर-योजनागत खर्चों में भारी कटौती का संतुलन बनाना अनिवार्य होगा।
औद्योगिक निवेश और भूमि नीति में बड़े सुधारों की मांग
पश्चिम बंगाल में विनिर्माण (Manufacturing) और सेवा (Service) दोनों क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित करने के लिए उद्योग जगत लंबे समय से नीतिगत बदलावों की मांग कर रहा है। जानकारों के अनुसार, राज्य में निवेश की राह में दो सबसे बड़े रोड़े हैं:
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पहला, शहरी भूमि (अधिकतम सीमा और विनियमन) अधिनियम, 1976 को पूरी तरह निरस्त करना।
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दूसरा, उद्योगों के लिए भूमि अधिग्रहण या भूमि खरीद में राज्य की भूमिका को रोकने वाली मौजूदा नीति को समाप्त करना।
चूंकि पश्चिम बंगाल में भूमि का मालिकाना हक अत्यधिक खंडित (작은 टुकड़ों में) है, इसलिए निजी निवेशकों के लिए सीधे तौर पर सैकड़ों भू-स्वामियों से बातचीत करके एक बड़ा औद्योगिक भूखंड खरीदना बेहद जटिल काम रहा है। इसके अतिरिक्त, राज्य की मौजूदा विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) नीति भी सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और सेवा क्षेत्र में नए निवेश को रोकने का काम करती रही है। ऐसे में आज के बजट पर पूरे उद्योग जगत की निगाहें टिकी हैं कि क्या सरकार इन महत्वपूर्ण सुधारों की दिशा में कोई बड़ी घोषणा करती है या नहीं।
उल्लेखनीय है कि इसी साल 5 फरवरी को तत्कालीन सरकार द्वारा अंतरिम बजट (वोट-ऑन-अकाउंट) पेश किया गया था, जिसके बाद राज्य में हुए विधानसभा चुनाव के बाद नई सरकार का गठन हुआ है।


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